🌍 PROSPERITY ALL OVER THE WORLD
🌳From the mode of goodness, real knowledge develops; from the mode of passion, greed develops; and from the mode of ignorance develop foolishness, madness and illusion.
Purport;When they are actually educated in the mode of goodness, they will become sober, in full knowledge of things as they are. Then people will be happy and prosperous. Even if the majority of the people aren't happy and prosperous, if a certain percentage of the population develops Kṛṣṇa consciousness and becomes situated in the mode of goodness, then there is the possibility for peace and prosperity all over the world.
(BG 14.17)
@ancientindia1
🌳From the mode of goodness, real knowledge develops; from the mode of passion, greed develops; and from the mode of ignorance develop foolishness, madness and illusion.
Purport;When they are actually educated in the mode of goodness, they will become sober, in full knowledge of things as they are. Then people will be happy and prosperous. Even if the majority of the people aren't happy and prosperous, if a certain percentage of the population develops Kṛṣṇa consciousness and becomes situated in the mode of goodness, then there is the possibility for peace and prosperity all over the world.
(BG 14.17)
@ancientindia1
Shubha Yamuna Shashti
Today is Yamuna Shashti appearance day of Krishna's beloved Yamuna Maharani.. ❤️🙏🏻
One verse from Yadabhyudam (based on life history of Krishna) by Param Shri Vaishnava Vedant Deshikan. ❤️🙏🏻
#yamuna #ganga #krishna #vaishnava #radhe #radhakrishna #haribol #hari
@ancientindia1
Today is Yamuna Shashti appearance day of Krishna's beloved Yamuna Maharani.. ❤️🙏🏻
One verse from Yadabhyudam (based on life history of Krishna) by Param Shri Vaishnava Vedant Deshikan. ❤️🙏🏻
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@ancientindia1
भगवती यमुना जी का आविर्भाव दिवस (चैत्र षष्ठी 'श्री यमुना जयंती')
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सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण को सर्वेश्वर माना गया है। हिंदू धर्मग्रंथों में उनकी जिन आठ पटरानियों का उल्लेख है, भगवती यमुना भी उनमें से एक हैं।
पुराणों के अनुसार यमुना जी भगवान सूर्य की पुत्री होने के साथ यमराज एवं शनिदेव की बहन भी हैं।
द्वापर युग में भगवती यमुना का आविर्भाव चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन हुआ था, अत: यह पावन तिथि यमुना जयंती के नाम से प्रसिद्ध हो गई।
ब्रज मंडल में प्रतिवर्ष यह महोत्सव बडे धूमधाम से मनाया जाता है।
मार्कण्डेय पुराण के मतानुसार गंगा-यमुना सगी बहनें हैं, जिस तरह गंगा का उद्गम गंगोत्री के समीप स्थित गोमुख से हुआ है, उसी तरह यमुना जी जब भूलोक में पधारीं, तब उनका उद्गम यमुनोत्री के समीप कालिंदगिरि से हुआ।
द्वापर युग में श्रीकृष्ण लीला के समय सर्वेश्वर श्रीकृष्ण एवं यमुना जी के पुनर्मिलन का वृत्तांत कुछ इस प्रकार है:-
एक बार श्रीकृष्ण अर्जुन को साथ लेकर घूमने गए, यमुनातट पर एक वृक्ष के नीचे दोनों विश्राम कर रहे थे।
श्रीकृष्ण को ध्यान मग्न देखकर अर्जुन टहलते हुए यमुना के किनारे कुछ दूर निकल गए।
वहां उन्होंने देखा कि यमुना नदी के भीतर स्वर्ण एवं रत्नों से सुसज्जित भवन में एक अतीव सुंदर स्त्री तप कर रही है।
अर्जुन ने जब उससे परिचय पूछा तो उसने कहा:- "मैं सूर्यदेव की पुत्री कालिंदी हूं, भगवान श्रीकृष्ण के लिए मेरे मन में अपार श्रद्धा है और मैं उन्हीं को पाने के लिए तप कर रही हूं।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।"
अर्जुन ने वापस लौटकर यह वृत्तांत श्रीकृष्ण को सुनाया तो श्यामसुंदर ने कालिंदी के पास जाकर उन्हें दर्शन दिया और उनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया।
इसके बाद श्रीकृष्ण ने सूर्यदेव के समक्ष उनकी पुत्री कालिंदी (यमुना) से विवाह का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने श्रीकृष्ण के साथ कालिंदी का विवाह कर दिया, इस प्रकार वह द्वारकाधीश श्रीकृष्ण की पटरानी बन गई।
जहां श्री कृष्ण ब्रज संस्कृति के जनक कहे जाते है, वहां यमुना ब्रज संस्कृति की जननी मानी जाती है।
उल्लेखनीय हैं। प्रयाग में यमुना एक विशाल नदी के रूप में प्रस्तुत होती है और वहाँ के प्रसिद्ध ऐतिहासिक किले के नीचे गंगा में मिल जाती है। ब्रज की संस्कृति में यमुना का महत्वपूर्ण स्थान है। पौराणिक स्रोत के अनुसार भूवनभास्कर सूर्य इसके पिता मृत्यु के देवता यम इसके भाई और भगवान श्री कृष्ण इसके परि स्वीकार्य किये गये हैं। जहाँ भगवान श्री कृष्ण ब्रज संस्कृति के जनक कहे जाते हैं, वहाँ यमुना इसकी जननी मानी जाती है। इस प्रकार यह सच्चे अर्थों में ब्रजवासियों की माता है। अतः ब्रज में इसे यमुना मैया कहते है। ब्रह्म पुराण में यमुना के आध्यात्मिक स्वरुप का स्पष्टीकरण करते हुए विवरण प्रस्तुत किया है जो सृष्टि का आधार है और जिसे लक्षणों से सच्चिदनंद स्वरूप कहा जाता है, उपनिषदों ने जिसका ब्रह्म रूप से गायन किया है, वही परमतत्व साक्षात् यमुना है।
यमुना भारत की एक नदी है। यह गंगा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है जो यह यमुनोत्री (उत्तरकाशी से ३० किमी उत्तर, गढ़वाल में) नामक जगह ब्रजभाषा के भक्त कवियों और विशेषतः वल्लभ सम्प्रदायी कवियों ने गिरिराज गोवर्धन की भाँति यमुना के प्रति भी अतिशय श्रद्धा व्यक्त की है। इस सम्प्रदाय का शायद ही कोई कवि हो, जिसने अपनी यमुना के प्रति अपनी काव्य श्रद्धांजलि अर्पित न की हो। उनका यमुना स्तुति संबंधी साहित्य ब्रजभाषा भक्ति काव्य का एक उल्लेखनीय अंग है। है। पुराणों में यमुना की महिमा कही गयी है। संवत 1549 में जब महाप्रभु वल्लभाचार्य ने यमुना अष्टक' की रचना की, तब यमुना का स्वरूप मनोहारी था। यमुना जी के दोनों किनारे सुन्दर वनों से पुष्प यमुना जी में झरते हैं और देव-दानव अर्थात दीन भाव वाले भक्त भली-भाँति पूजा करते हैं। उनके जल में उठती तरंगे मानों उनके हाथ के कंगन हैं किनारों पर चमकती रेत कंगनों में फंसे मोती हैं। दोनों तट उनके नितंब हैं। आप अगणित गुणों से शोभित है। शिव, ब्रह्मा और देव आपकी स्तुति करते हैं। जल प्रपूरित मेघश्याम बादलों जैसा आपका वर्ण है। श्री यमुना के साथ गंगा का संगम होने से गंगा जी भगवान की प्रिय बन, फिर गंगा जी ने उनके भक्तों को भगवान की सभी सिध्दियां प्रदान की। आपको नमन है, आपका चरित्र अद्भुत है। आपके पय के पान करने से कभी यमराज की पीड़ाएं नहीं भोगनी पड़तीं। स्वयं की संतानें दुष्ट हो तो भी यमराज उन्हें किस तरह मारे।
यमुनाष्टकम
〰️〰️〰️〰️
मुरारिकायकालिमाललामवारिधारिणी
तृणीकृतत्रिविष्टपा त्रिलोकशोकहारिणी।
मनोऽनुकूलकूलकुञ्जपुञ्जधूतदुर्मदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥१॥
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सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण को सर्वेश्वर माना गया है। हिंदू धर्मग्रंथों में उनकी जिन आठ पटरानियों का उल्लेख है, भगवती यमुना भी उनमें से एक हैं।
पुराणों के अनुसार यमुना जी भगवान सूर्य की पुत्री होने के साथ यमराज एवं शनिदेव की बहन भी हैं।
द्वापर युग में भगवती यमुना का आविर्भाव चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन हुआ था, अत: यह पावन तिथि यमुना जयंती के नाम से प्रसिद्ध हो गई।
ब्रज मंडल में प्रतिवर्ष यह महोत्सव बडे धूमधाम से मनाया जाता है।
मार्कण्डेय पुराण के मतानुसार गंगा-यमुना सगी बहनें हैं, जिस तरह गंगा का उद्गम गंगोत्री के समीप स्थित गोमुख से हुआ है, उसी तरह यमुना जी जब भूलोक में पधारीं, तब उनका उद्गम यमुनोत्री के समीप कालिंदगिरि से हुआ।
द्वापर युग में श्रीकृष्ण लीला के समय सर्वेश्वर श्रीकृष्ण एवं यमुना जी के पुनर्मिलन का वृत्तांत कुछ इस प्रकार है:-
एक बार श्रीकृष्ण अर्जुन को साथ लेकर घूमने गए, यमुनातट पर एक वृक्ष के नीचे दोनों विश्राम कर रहे थे।
श्रीकृष्ण को ध्यान मग्न देखकर अर्जुन टहलते हुए यमुना के किनारे कुछ दूर निकल गए।
वहां उन्होंने देखा कि यमुना नदी के भीतर स्वर्ण एवं रत्नों से सुसज्जित भवन में एक अतीव सुंदर स्त्री तप कर रही है।
अर्जुन ने जब उससे परिचय पूछा तो उसने कहा:- "मैं सूर्यदेव की पुत्री कालिंदी हूं, भगवान श्रीकृष्ण के लिए मेरे मन में अपार श्रद्धा है और मैं उन्हीं को पाने के लिए तप कर रही हूं।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।"
अर्जुन ने वापस लौटकर यह वृत्तांत श्रीकृष्ण को सुनाया तो श्यामसुंदर ने कालिंदी के पास जाकर उन्हें दर्शन दिया और उनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया।
इसके बाद श्रीकृष्ण ने सूर्यदेव के समक्ष उनकी पुत्री कालिंदी (यमुना) से विवाह का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने श्रीकृष्ण के साथ कालिंदी का विवाह कर दिया, इस प्रकार वह द्वारकाधीश श्रीकृष्ण की पटरानी बन गई।
जहां श्री कृष्ण ब्रज संस्कृति के जनक कहे जाते है, वहां यमुना ब्रज संस्कृति की जननी मानी जाती है।
उल्लेखनीय हैं। प्रयाग में यमुना एक विशाल नदी के रूप में प्रस्तुत होती है और वहाँ के प्रसिद्ध ऐतिहासिक किले के नीचे गंगा में मिल जाती है। ब्रज की संस्कृति में यमुना का महत्वपूर्ण स्थान है। पौराणिक स्रोत के अनुसार भूवनभास्कर सूर्य इसके पिता मृत्यु के देवता यम इसके भाई और भगवान श्री कृष्ण इसके परि स्वीकार्य किये गये हैं। जहाँ भगवान श्री कृष्ण ब्रज संस्कृति के जनक कहे जाते हैं, वहाँ यमुना इसकी जननी मानी जाती है। इस प्रकार यह सच्चे अर्थों में ब्रजवासियों की माता है। अतः ब्रज में इसे यमुना मैया कहते है। ब्रह्म पुराण में यमुना के आध्यात्मिक स्वरुप का स्पष्टीकरण करते हुए विवरण प्रस्तुत किया है जो सृष्टि का आधार है और जिसे लक्षणों से सच्चिदनंद स्वरूप कहा जाता है, उपनिषदों ने जिसका ब्रह्म रूप से गायन किया है, वही परमतत्व साक्षात् यमुना है।
यमुना भारत की एक नदी है। यह गंगा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है जो यह यमुनोत्री (उत्तरकाशी से ३० किमी उत्तर, गढ़वाल में) नामक जगह ब्रजभाषा के भक्त कवियों और विशेषतः वल्लभ सम्प्रदायी कवियों ने गिरिराज गोवर्धन की भाँति यमुना के प्रति भी अतिशय श्रद्धा व्यक्त की है। इस सम्प्रदाय का शायद ही कोई कवि हो, जिसने अपनी यमुना के प्रति अपनी काव्य श्रद्धांजलि अर्पित न की हो। उनका यमुना स्तुति संबंधी साहित्य ब्रजभाषा भक्ति काव्य का एक उल्लेखनीय अंग है। है। पुराणों में यमुना की महिमा कही गयी है। संवत 1549 में जब महाप्रभु वल्लभाचार्य ने यमुना अष्टक' की रचना की, तब यमुना का स्वरूप मनोहारी था। यमुना जी के दोनों किनारे सुन्दर वनों से पुष्प यमुना जी में झरते हैं और देव-दानव अर्थात दीन भाव वाले भक्त भली-भाँति पूजा करते हैं। उनके जल में उठती तरंगे मानों उनके हाथ के कंगन हैं किनारों पर चमकती रेत कंगनों में फंसे मोती हैं। दोनों तट उनके नितंब हैं। आप अगणित गुणों से शोभित है। शिव, ब्रह्मा और देव आपकी स्तुति करते हैं। जल प्रपूरित मेघश्याम बादलों जैसा आपका वर्ण है। श्री यमुना के साथ गंगा का संगम होने से गंगा जी भगवान की प्रिय बन, फिर गंगा जी ने उनके भक्तों को भगवान की सभी सिध्दियां प्रदान की। आपको नमन है, आपका चरित्र अद्भुत है। आपके पय के पान करने से कभी यमराज की पीड़ाएं नहीं भोगनी पड़तीं। स्वयं की संतानें दुष्ट हो तो भी यमराज उन्हें किस तरह मारे।
यमुनाष्टकम
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मुरारिकायकालिमाललामवारिधारिणी
तृणीकृतत्रिविष्टपा त्रिलोकशोकहारिणी।
मनोऽनुकूलकूलकुञ्जपुञ्जधूतदुर्मदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥१॥
आपकी नदी का जल मुरारी (श्रीकृष्ण) के शरीर के सुंदर (नीले) रंग को छूता है।
और इसलिए कृष्ण के स्पर्श के कारण ये स्वर्ग को तुच्छ बनाकर, तीनों संसार के दुखों को दूर करने के लिए आगे बढ़ता है। श्री कृष्ण के द्वारा स्पर्श की गयी ये यमुना जी की धारा हमारे अहंकार को मिटा देती है और हमें भक्तिमय बना देती है।
हे कालिंदी नंदिनी , कृपया करके मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो।
मलापहारिवारिपूरभूरिमण्डितामृता
भृशं प्रपातकप्रवञ्चनातिपण्डितानिशम्।
सुनन्दनन्दनाङ्गसङ्गरागरञ्जिता हिता
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥२॥
आपकी नदी का पानी, जो अशुद्धियों को दूर करता है, प्रचुर मात्रा में अमृत जैसे गुणों से जो भरा है ,
जो पापियों के मन में गहरे बैठे पापों को धोने में एक विशेषज्ञ है, न जाने कितने युगो से सबके पाप आप धोती आ रही है लगातार, आपका जल अत्यंत लाभकारी है, पुण्य नंदा गोप के पुत्र के शरीर के स्पर्श से रंगीन हो रहा है
हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
लसत्तरङ्गसङ्गधूतभूतजातपातका
नवीनमाधुरीधुरीणभक्तिजातचातका।
तटान्तवासदासहंससंसृता हि कामदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥३॥
आपकी चमक और चंचल लहरों का स्पर्श जीवित जीवों में उठने वाले पापों को धो देता है, इनमे कई चातक पक्षियों (प्रतीकात्मक) का निवास करते है जो भक्ति (भक्ति) से पैदा हुई ताजी मिठास भरे जल ले जाते हैं (और एक भक्त हमेशा भक्ति की ओर देखते हैं जैसे चातक पक्षी पानी की ओर देखते हैं) आप इतनी कृपामयी हो जल पे बैठे एक हंस को भी आशीर्वाद देती हो जो आपकी नदी के किनारों की सीमा पर अभिसरण और निवास करते हैं, हे कालिंदी नंदिनी (कालिंद पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
विहाररासखेदभेदधीरतीरमारुता
गता गिरामगोचरे यदीयनीरचारुता।
प्रवाहसाहचर्यपूतमेदिनीनदीनदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥४॥
हे यमुना महारानी आपके इस शांत नदी के किनारे हमे अतीत के वो राधा-कृष्णा और गोपियों की रास लीला की याद दिलाती है और इसे वृन्दावन की कई यादें जुड़ी हैं, और जब इन आध्यत्मिक संगम के साथ जो कोई आपका दर्शन करता है तब आपकी नदी के जल की सुंदरता और बढ़ जाती है। आपके जल के प्रवाह के साथ संबंध के कारण, पृथ्वी और अन्य नदियाँ भी शुद्ध हो गई हैं,
हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
तरङ्गसङ्गसैकताञ्चितान्तरा सदासिता
शरन्निशाकरांशुमञ्जुमञ्जरीसभाजिता।
भवार्चनाय चारुणाम्बुनाधुना विशारदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥५॥
नदी के रेत हमेशा आपके बहने वाली लहरों के संपर्क में रहने से चमकती रहती है, नदी और नदी के किनारे शरद ऋतु की रात को और खूबसूरत दीखते है। जो आपके इस रूप की पूजा करते है आप उस संसार के लोगो के सभी पापो को धोने में परनता सक्षम हो। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंद पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो।
जलान्तकेलिकारिचारुराधिकाङ्गरागिणी
स्वभर्तुरन्यदुर्लभाङ्गसङ्गतांशभागिनी
स्वदत्तसुप्तसप्तसिन्धुभेदनातिकोविदा।
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥६॥
आपकी नदी-देह उस सुंदर राधारानी के स्पर्श से रंगी है जो आपके इस जल से श्रीकृष्ण के साथ खेला करती थी। आप दूसरों को उस पवित्र स्पर्श (राधा-कृष्ण के) से पोषण करती हो , जिसे प्राप्त करना बहुत मुश्किल है, आप सप्त सिन्धु (सात नदियों) के साथ पवित्र स्पर्श को भी चुपचाप साझा करती हो, आप तेज और कृपा फ़ैलाने पे अति निपुण हैं। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
जलच्युताच्युताङ्गरागलम्पटालिशालिनी
विलोलराधिकाकचान्तचम्पकालिमालिनी।
सदावगाहनावतीर्णभर्तृभृत्यनारदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥७॥
आपके इस नदी जल में अच्युता (श्रीकृष्ण) का रंग मिल गया है, तभी आप श्यामल दिखती हो जब वह भावुक गोपियों के साथ खेलते थे , जो मधुमक्खियों की तरह उनके संग घूमती थी। और कभी कभी ऐसा लगता है जैसा राधा रानी के बालो पे लगे काम्पका फूल पे जैसे मधुमखियाँ घूम रही हो।
(और आपके नदी में भगवान के सेवक नारद, हमेशा स्नान करने के लिए उतरते हैं। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
सदैव नन्दनन्दकेलिशालिकुञ्जमञ्जुला
तटोत्थफुल्लमल्लिकाकदम्बरेणुसूज्ज्वला
जलावगाहिनां नृणां भवाब्धिसिन्धुपारदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥८॥
आपका नदी-तट सुंदर घाटियों में नंदा का बेटा (यानी श्रीकृष्ण) हमेशा खेलते हैं, और आपके नदी के किनारे मल्लिका और कदंब के फूलों के पराग (यानी फूल) के साथ चमकता ही रहता है। वे व्यक्ति जो आपकी नदी के पानी में स्नान करते हैं, आप उन्हें दुनियावी अस्तित्व के महासागर में ले जाते हैं उस परमांनद की अनभूति कराती है। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री),
और इसलिए कृष्ण के स्पर्श के कारण ये स्वर्ग को तुच्छ बनाकर, तीनों संसार के दुखों को दूर करने के लिए आगे बढ़ता है। श्री कृष्ण के द्वारा स्पर्श की गयी ये यमुना जी की धारा हमारे अहंकार को मिटा देती है और हमें भक्तिमय बना देती है।
हे कालिंदी नंदिनी , कृपया करके मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो।
मलापहारिवारिपूरभूरिमण्डितामृता
भृशं प्रपातकप्रवञ्चनातिपण्डितानिशम्।
सुनन्दनन्दनाङ्गसङ्गरागरञ्जिता हिता
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥२॥
आपकी नदी का पानी, जो अशुद्धियों को दूर करता है, प्रचुर मात्रा में अमृत जैसे गुणों से जो भरा है ,
जो पापियों के मन में गहरे बैठे पापों को धोने में एक विशेषज्ञ है, न जाने कितने युगो से सबके पाप आप धोती आ रही है लगातार, आपका जल अत्यंत लाभकारी है, पुण्य नंदा गोप के पुत्र के शरीर के स्पर्श से रंगीन हो रहा है
हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
लसत्तरङ्गसङ्गधूतभूतजातपातका
नवीनमाधुरीधुरीणभक्तिजातचातका।
तटान्तवासदासहंससंसृता हि कामदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥३॥
आपकी चमक और चंचल लहरों का स्पर्श जीवित जीवों में उठने वाले पापों को धो देता है, इनमे कई चातक पक्षियों (प्रतीकात्मक) का निवास करते है जो भक्ति (भक्ति) से पैदा हुई ताजी मिठास भरे जल ले जाते हैं (और एक भक्त हमेशा भक्ति की ओर देखते हैं जैसे चातक पक्षी पानी की ओर देखते हैं) आप इतनी कृपामयी हो जल पे बैठे एक हंस को भी आशीर्वाद देती हो जो आपकी नदी के किनारों की सीमा पर अभिसरण और निवास करते हैं, हे कालिंदी नंदिनी (कालिंद पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
विहाररासखेदभेदधीरतीरमारुता
गता गिरामगोचरे यदीयनीरचारुता।
प्रवाहसाहचर्यपूतमेदिनीनदीनदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥४॥
हे यमुना महारानी आपके इस शांत नदी के किनारे हमे अतीत के वो राधा-कृष्णा और गोपियों की रास लीला की याद दिलाती है और इसे वृन्दावन की कई यादें जुड़ी हैं, और जब इन आध्यत्मिक संगम के साथ जो कोई आपका दर्शन करता है तब आपकी नदी के जल की सुंदरता और बढ़ जाती है। आपके जल के प्रवाह के साथ संबंध के कारण, पृथ्वी और अन्य नदियाँ भी शुद्ध हो गई हैं,
हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
तरङ्गसङ्गसैकताञ्चितान्तरा सदासिता
शरन्निशाकरांशुमञ्जुमञ्जरीसभाजिता।
भवार्चनाय चारुणाम्बुनाधुना विशारदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥५॥
नदी के रेत हमेशा आपके बहने वाली लहरों के संपर्क में रहने से चमकती रहती है, नदी और नदी के किनारे शरद ऋतु की रात को और खूबसूरत दीखते है। जो आपके इस रूप की पूजा करते है आप उस संसार के लोगो के सभी पापो को धोने में परनता सक्षम हो। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंद पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो।
जलान्तकेलिकारिचारुराधिकाङ्गरागिणी
स्वभर्तुरन्यदुर्लभाङ्गसङ्गतांशभागिनी
स्वदत्तसुप्तसप्तसिन्धुभेदनातिकोविदा।
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥६॥
आपकी नदी-देह उस सुंदर राधारानी के स्पर्श से रंगी है जो आपके इस जल से श्रीकृष्ण के साथ खेला करती थी। आप दूसरों को उस पवित्र स्पर्श (राधा-कृष्ण के) से पोषण करती हो , जिसे प्राप्त करना बहुत मुश्किल है, आप सप्त सिन्धु (सात नदियों) के साथ पवित्र स्पर्श को भी चुपचाप साझा करती हो, आप तेज और कृपा फ़ैलाने पे अति निपुण हैं। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
जलच्युताच्युताङ्गरागलम्पटालिशालिनी
विलोलराधिकाकचान्तचम्पकालिमालिनी।
सदावगाहनावतीर्णभर्तृभृत्यनारदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥७॥
आपके इस नदी जल में अच्युता (श्रीकृष्ण) का रंग मिल गया है, तभी आप श्यामल दिखती हो जब वह भावुक गोपियों के साथ खेलते थे , जो मधुमक्खियों की तरह उनके संग घूमती थी। और कभी कभी ऐसा लगता है जैसा राधा रानी के बालो पे लगे काम्पका फूल पे जैसे मधुमखियाँ घूम रही हो।
(और आपके नदी में भगवान के सेवक नारद, हमेशा स्नान करने के लिए उतरते हैं। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री), कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
सदैव नन्दनन्दकेलिशालिकुञ्जमञ्जुला
तटोत्थफुल्लमल्लिकाकदम्बरेणुसूज्ज्वला
जलावगाहिनां नृणां भवाब्धिसिन्धुपारदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा॥८॥
आपका नदी-तट सुंदर घाटियों में नंदा का बेटा (यानी श्रीकृष्ण) हमेशा खेलते हैं, और आपके नदी के किनारे मल्लिका और कदंब के फूलों के पराग (यानी फूल) के साथ चमकता ही रहता है। वे व्यक्ति जो आपकी नदी के पानी में स्नान करते हैं, आप उन्हें दुनियावी अस्तित्व के महासागर में ले जाते हैं उस परमांनद की अनभूति कराती है। हे कालिंदी नंदिनी (कलिंदा पर्वत की पुत्री),
कृपया मेरे मन से अशुद्धियों को दूर करो,
यमुना अष्टकम पढ़ने के लाभ
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यमुना महारानी जो की सूर्य की बेटी, जो लोग इस आठ गुना प्रशंसा का आनंद लेते हैं इसे पढ़ते है। उनकी सभी अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और श्री कृष्ण उनको प्यार करते हैं। उसके माध्यम से सभी भक्ति शक्तियाँ प्राप्त होती हैं और श्री कृष्ण प्रसन्न होते हैं। वह भक्तों के स्वभाव को बदल देता है। जो व्यक्ति मुक्ति- भक्ति चाहते हैं, उन्हें नियमित रूप से यमुना अष्टकम का पाठ करना चाहिए।
* भगवान श्रीकृष्ण की प्रिया यमुना ब्रजमंडल की आराध्या हैं, ब्रजवासी इन्हें नदी नहीं, बल्कि साक्षात देवी ही मानते हैं।
* मथुरा के विश्राम घाट तथा वृंदावन के केशी घाट पर प्रतिदिन होने वाली यमुना जी की आरती में अंसख्य श्रद्धालु भाग लेते हैं।
* ब्रज में आने वाला हर तीर्थयात्री यमुना जी का पूजन करके उन्हें दीपदान अवश्य करता है।
* मनोरथ पूर्ण होने पर भक्तगण अनेक साडियों को जोडकर यमुना जी को चुनरी चढाते हैं।
* ब्रजमंडल में ठाकुर जी का स्नान तथा उनके भोग की तैयारी यमुना जल से ही होती है।
* श्रीनाथ जी का श्रीविग्रह ब्रज से मेवाड भले ही पहुंच गया हो, पर उनकी सेवाओं में केवल यमुनाजल का ही प्रयोग होता है।
आज भी मथुरा से नित्य यमुनाजल सुरक्षित पात्रों में भरकर श्रीनाथद्वारा भेजा जाता है।
* यमुनाजी का वाहन कच्छप (कछुआ) है।
आदिवाराह पुराण के अनुसार यमुनाजी में स्नान करने से जन्मान्तर के पाप भस्म हो जाते हैं।
इतना ही नहीं जो व्यक्ति दूर रहकर भी भक्ति भावना के साथ यमुनाजी का स्मरण करता है वह भी पवित्र हो जाता है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज हमने यमुना जी को प्रदूषित कर दिया है।
अत: उन्हें प्रदूषण से मुक्त कराने के लिए हमें सार्थक प्रयास करना होगा, तभी हमारा यमुना पूजन सफल होगा।
डॉ0 विजय शंकर मिश्र:!
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@ancientindia1
यमुना अष्टकम पढ़ने के लाभ
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यमुना महारानी जो की सूर्य की बेटी, जो लोग इस आठ गुना प्रशंसा का आनंद लेते हैं इसे पढ़ते है। उनकी सभी अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और श्री कृष्ण उनको प्यार करते हैं। उसके माध्यम से सभी भक्ति शक्तियाँ प्राप्त होती हैं और श्री कृष्ण प्रसन्न होते हैं। वह भक्तों के स्वभाव को बदल देता है। जो व्यक्ति मुक्ति- भक्ति चाहते हैं, उन्हें नियमित रूप से यमुना अष्टकम का पाठ करना चाहिए।
* भगवान श्रीकृष्ण की प्रिया यमुना ब्रजमंडल की आराध्या हैं, ब्रजवासी इन्हें नदी नहीं, बल्कि साक्षात देवी ही मानते हैं।
* मथुरा के विश्राम घाट तथा वृंदावन के केशी घाट पर प्रतिदिन होने वाली यमुना जी की आरती में अंसख्य श्रद्धालु भाग लेते हैं।
* ब्रज में आने वाला हर तीर्थयात्री यमुना जी का पूजन करके उन्हें दीपदान अवश्य करता है।
* मनोरथ पूर्ण होने पर भक्तगण अनेक साडियों को जोडकर यमुना जी को चुनरी चढाते हैं।
* ब्रजमंडल में ठाकुर जी का स्नान तथा उनके भोग की तैयारी यमुना जल से ही होती है।
* श्रीनाथ जी का श्रीविग्रह ब्रज से मेवाड भले ही पहुंच गया हो, पर उनकी सेवाओं में केवल यमुनाजल का ही प्रयोग होता है।
आज भी मथुरा से नित्य यमुनाजल सुरक्षित पात्रों में भरकर श्रीनाथद्वारा भेजा जाता है।
* यमुनाजी का वाहन कच्छप (कछुआ) है।
आदिवाराह पुराण के अनुसार यमुनाजी में स्नान करने से जन्मान्तर के पाप भस्म हो जाते हैं।
इतना ही नहीं जो व्यक्ति दूर रहकर भी भक्ति भावना के साथ यमुनाजी का स्मरण करता है वह भी पवित्र हो जाता है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज हमने यमुना जी को प्रदूषित कर दिया है।
अत: उन्हें प्रदूषण से मुक्त कराने के लिए हमें सार्थक प्रयास करना होगा, तभी हमारा यमुना पूजन सफल होगा।
डॉ0 विजय शंकर मिश्र:!
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@ancientindia1
🌼⚜️ #पार्वती_माता_स्तुति ⚜️🌼
#पार्वती माता जी की यह स्तुति गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री रामचरितमानस के बालकाण्ड से ली गई है। सीता जी धनुयज्ञ के पहले गौरी पूजन के लिए वहां बाग लगाया गया था। सीता जी श्री राम के दर्शन के बाद उन्हें पति रूप में प्राप्त करने के लिए गौरी (पार्वती जी) की निम्नतम स्तुति से पूजा की गई।
जय जय गिरिबरराज किसोरी।
जय महेस मुख चंद चकोरी। ।।
जय गजबदन षदानन माता।
जगत जननि दामिनी दुति गता । ।।
नहिं तव आदि मध्य अवसाना।
अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना । ।।
भव भव बिभव परभव करिणी।
बिस्व बिमाही स्वबस बिहारिनी।।
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव लिंग।
महिमा अमित न सखिं कहै सहस सारदा शेष । ।।
सेवत तोहि सहज फल चारी।
बरदायिनी पुरारि पिरि ।।
देबि पूजी पद कमलफे।
सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे ।।
मोर मनोरथु जानहु नीके।
बसहु सदा उर पुर सबहीं ।।
कीन्हेउँ प्रगट न करण तेहिं।
अस कहि चरण गहे बदेहीं ।।
बिनय प्रेम बस भाई भवानी।
खसि माल मूरति मुसुकानि ।।
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेउ।
बोली गौरी हरषु हियँ अंतिमौ ।।
सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजिहि मन इच्छा विवाह ।।
नारद बचन सदा सुचि सच्चा।
सो बरु मिलिहि जाहिं मनु रचा ।।
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुन्दर साँवरो।
करुणा निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो । ।।
एहि भाँति गौरी असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवनिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चाले । ।।
जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लागे । ।।
देवी पार्वती की स्तुति जय जय गिरिवर राज किशोरी
🌼⚜️ देवी पार्वती की स्तुति हिंदी अर्थ-⚜️🌼
जय जय गिरिबरराज किसोरी।
जय महेस मुख चंद चकोरी। ।।
जय गजबदन षदानन माता।
जगत जननि दामिनी दुति गता ।।
हे पर्वतराज हिमाचल की आपकी बेटी जय हो, जय हो। महादेव के मुखरूपी चन्द्रमा को देखनेवाली चकोरी आपकी जय हो। हे बिजली सी कांति से युक्त शरीर वाली जगतजननी, हे हाथी के मुख वाले गणेश जी और षड्मुख वाले कार्तिकेय जी की माता आपकी जय हो।
नहिं तव आदि मध्य अवसाना।
अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना ।।
भव भव बिभव परभव करिणी।
बिस्व बिमाही स्वबस बिहारिनी।।
हे माता न आपका अभिषेक है, न मध्य है और न अंत है। आपके कोटेशन प्रभाव के बारे में भी नहीं पता। आप दुनिया को उत्पन्न करनेवाली, पालनेवाली और नाश करनेवाली हैं। आप विश्व को मोहित करनेवाली हैं और स्वतंत्र रूप से विहार करनेवाली हैं।
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव लिंग।
महिमा अमित न सखिं कहै सहस सारदा शेष । ।।
पति को इष्टदेव वली श्रेष्ठ नारियों में हे माता आपकी पहली गणना है। आपकी अपार महिमा को हजारों सरस्वती और शेष जी भी नहीं कह सकते।
सेवत तोहि सहज फल चारी।
बरदायिनी पुरारि पिरि ।।
देबि पूजी पद कमलफे।
सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे ।।
वे वर देने वाली त्रिपुरारी (त्रिपुर के शत्रु) शिव की पत्नी हैं, आपकी सेवा से चारों ओर फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) आसानी से मिल जाते हैं। हे देवी ! आपके चरणकमलों की पूजा करके देवता, मनुष्य और मुनि सभी सुखी हो जाते हैं।
मोर मनोरथु जानहु नीके।
बसहु सदा उर पुर सबहीं । ।।
कीन्हेउँ प्रगट न करण तेहिं।
अस कहि चरण गहे बदेहीं । ।।
मेरे मनोरथ को आप भलीभाँति कहते हैं क्योंकि आप सदा सर्वसाधारण हृदय रूपी नगरी में रहते हैं। इसी कारण से कि मैं उदय न कर सकूं, यह सचिव सीताजी ने अपने चरण पर कब्जा कर लिया।
बिनय प्रेम बस भाई भवानी।
खसि माल मूरति मुसुकानि । ।।
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेउ।
बोली गौरी हरषु हियँ अंतिमौ । ।।
भगवती पार्वती सीताजी के विनायक और प्रेम के वश में हो गए, उनके गले से गले तक खिसक गए और उनकी मूर्तियां बन गईं। माता पार्वती का हृदय हर्ष से भर गया और वे बोलीं
सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजिहि मन इच्छा विवाह ।।
नारद बचन सदा सुचि सच्चा।
सो बरु मिलिहि जाहिं मनु रचा ।।
माता पार्वती का हृदय हर्ष से भर गया और वे बोलीं- “हे सीता! मेरा सच्चा आशिष सुनो, तेरा मन पूरा होगा। नारदजी का वचन सदा पवित्र और सत्य है।
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुन्दर साँवरो।
करुणा निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो । ।।
जो वरफे दिल में बसा है वही वर चाहता है। जिसमें विदेशी मन अनुरक्त हो गया वही स्वभाव से सुंदर, सांवला वर संकट जाएगा। वह दया से पूर्ण और सर्वज्ञ है, नकली शील और स्नेह से जनता है।"
एहि भाँति गौरी असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवनिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चाले ।।
इस प्रकार गौरी जी का आशीर्वाद जानकीजी सहित सभी साखियाँ हर्षित अनामिका हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि भवानी जी को बार-बार पूजकर सीताजी मन से राजमहल लौटकर चलीं।
जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लागे । ।।
#पार्वती माता जी की यह स्तुति गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री रामचरितमानस के बालकाण्ड से ली गई है। सीता जी धनुयज्ञ के पहले गौरी पूजन के लिए वहां बाग लगाया गया था। सीता जी श्री राम के दर्शन के बाद उन्हें पति रूप में प्राप्त करने के लिए गौरी (पार्वती जी) की निम्नतम स्तुति से पूजा की गई।
जय जय गिरिबरराज किसोरी।
जय महेस मुख चंद चकोरी। ।।
जय गजबदन षदानन माता।
जगत जननि दामिनी दुति गता । ।।
नहिं तव आदि मध्य अवसाना।
अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना । ।।
भव भव बिभव परभव करिणी।
बिस्व बिमाही स्वबस बिहारिनी।।
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव लिंग।
महिमा अमित न सखिं कहै सहस सारदा शेष । ।।
सेवत तोहि सहज फल चारी।
बरदायिनी पुरारि पिरि ।।
देबि पूजी पद कमलफे।
सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे ।।
मोर मनोरथु जानहु नीके।
बसहु सदा उर पुर सबहीं ।।
कीन्हेउँ प्रगट न करण तेहिं।
अस कहि चरण गहे बदेहीं ।।
बिनय प्रेम बस भाई भवानी।
खसि माल मूरति मुसुकानि ।।
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेउ।
बोली गौरी हरषु हियँ अंतिमौ ।।
सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजिहि मन इच्छा विवाह ।।
नारद बचन सदा सुचि सच्चा।
सो बरु मिलिहि जाहिं मनु रचा ।।
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुन्दर साँवरो।
करुणा निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो । ।।
एहि भाँति गौरी असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवनिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चाले । ।।
जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लागे । ।।
देवी पार्वती की स्तुति जय जय गिरिवर राज किशोरी
🌼⚜️ देवी पार्वती की स्तुति हिंदी अर्थ-⚜️🌼
जय जय गिरिबरराज किसोरी।
जय महेस मुख चंद चकोरी। ।।
जय गजबदन षदानन माता।
जगत जननि दामिनी दुति गता ।।
हे पर्वतराज हिमाचल की आपकी बेटी जय हो, जय हो। महादेव के मुखरूपी चन्द्रमा को देखनेवाली चकोरी आपकी जय हो। हे बिजली सी कांति से युक्त शरीर वाली जगतजननी, हे हाथी के मुख वाले गणेश जी और षड्मुख वाले कार्तिकेय जी की माता आपकी जय हो।
नहिं तव आदि मध्य अवसाना।
अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना ।।
भव भव बिभव परभव करिणी।
बिस्व बिमाही स्वबस बिहारिनी।।
हे माता न आपका अभिषेक है, न मध्य है और न अंत है। आपके कोटेशन प्रभाव के बारे में भी नहीं पता। आप दुनिया को उत्पन्न करनेवाली, पालनेवाली और नाश करनेवाली हैं। आप विश्व को मोहित करनेवाली हैं और स्वतंत्र रूप से विहार करनेवाली हैं।
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव लिंग।
महिमा अमित न सखिं कहै सहस सारदा शेष । ।।
पति को इष्टदेव वली श्रेष्ठ नारियों में हे माता आपकी पहली गणना है। आपकी अपार महिमा को हजारों सरस्वती और शेष जी भी नहीं कह सकते।
सेवत तोहि सहज फल चारी।
बरदायिनी पुरारि पिरि ।।
देबि पूजी पद कमलफे।
सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे ।।
वे वर देने वाली त्रिपुरारी (त्रिपुर के शत्रु) शिव की पत्नी हैं, आपकी सेवा से चारों ओर फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) आसानी से मिल जाते हैं। हे देवी ! आपके चरणकमलों की पूजा करके देवता, मनुष्य और मुनि सभी सुखी हो जाते हैं।
मोर मनोरथु जानहु नीके।
बसहु सदा उर पुर सबहीं । ।।
कीन्हेउँ प्रगट न करण तेहिं।
अस कहि चरण गहे बदेहीं । ।।
मेरे मनोरथ को आप भलीभाँति कहते हैं क्योंकि आप सदा सर्वसाधारण हृदय रूपी नगरी में रहते हैं। इसी कारण से कि मैं उदय न कर सकूं, यह सचिव सीताजी ने अपने चरण पर कब्जा कर लिया।
बिनय प्रेम बस भाई भवानी।
खसि माल मूरति मुसुकानि । ।।
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेउ।
बोली गौरी हरषु हियँ अंतिमौ । ।।
भगवती पार्वती सीताजी के विनायक और प्रेम के वश में हो गए, उनके गले से गले तक खिसक गए और उनकी मूर्तियां बन गईं। माता पार्वती का हृदय हर्ष से भर गया और वे बोलीं
सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजिहि मन इच्छा विवाह ।।
नारद बचन सदा सुचि सच्चा।
सो बरु मिलिहि जाहिं मनु रचा ।।
माता पार्वती का हृदय हर्ष से भर गया और वे बोलीं- “हे सीता! मेरा सच्चा आशिष सुनो, तेरा मन पूरा होगा। नारदजी का वचन सदा पवित्र और सत्य है।
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुन्दर साँवरो।
करुणा निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो । ।।
जो वरफे दिल में बसा है वही वर चाहता है। जिसमें विदेशी मन अनुरक्त हो गया वही स्वभाव से सुंदर, सांवला वर संकट जाएगा। वह दया से पूर्ण और सर्वज्ञ है, नकली शील और स्नेह से जनता है।"
एहि भाँति गौरी असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवनिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चाले ।।
इस प्रकार गौरी जी का आशीर्वाद जानकीजी सहित सभी साखियाँ हर्षित अनामिका हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि भवानी जी को बार-बार पूजकर सीताजी मन से राजमहल लौटकर चलीं।
जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लागे । ।।
गौरी जी को सीताजी के अनुकूल ज्ञान जो हर्षित हुआ वह नहीं कह सका। सुंदर मंगलों के साथ उनके वाम अंग फड़कने लगे।
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